मीठी-मीठी भू जहाँ , गंध सुहानी देय।
सब सुख सुलभ होय वहाँ, कृपा-सिंधु सब देय।।
कृपा-सिंधु सब देय, तो बढ़े वंश धन-धान।
सभी देय सम्मान, कोर्ट-कचहरी में मान।।
कह `वाणी´ कविराज, दु:ख-दर्द सब के भागे।
जाय खरीदो प्लाट, भू जहाँ मीठी लागे।।
सब सुख सुलभ होय वहाँ, कृपा-सिंधु सब देय।।
कृपा-सिंधु सब देय, तो बढ़े वंश धन-धान।
सभी देय सम्मान, कोर्ट-कचहरी में मान।।
कह `वाणी´ कविराज, दु:ख-दर्द सब के भागे।
जाय खरीदो प्लाट, भू जहाँ मीठी लागे।।
शब्दार्थ : मीठी लागे = मिट्टी का स्वाद मीठा लगना, भू = भूमि
भावार्थ : विद्वान्-पंडितों के लिए वही आवासीय भूखण्ड सर्वश्रेष्ठ होता है, जिस मिट्टी का स्वाद मीठा एवं गंध सुहानी हो। वहाँ कृपा-सिन्धु के सदैव प्रसन्न रहने से वंश, धन-धान्य और सभी प्रकार के सुख स्वत: बढ़ते हैं। कोर्ट-कचहरी के विवाद आपके पक्ष में निकलने से सम्मान-वृद्धि होती है।
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